भारतीय कला परिदृश्य: विद्वानों की राय.

 भारतीय कला परिदृश्य पर कुछ ख्यातिलब्ध विद्वानों के विचारों को आप तक पहुंचाने का इस आलेख द्वारा मेरा विनम्र प्रयास है। आशा है उनकी ज्ञान साधना का फल हमें भारतीय कला दृष्टि को  समझने में सहायक होगा और साथ ही हमारे सौंदर्य बोध का भी विस्तार करेगा।
 
गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर 'संगीत' को कला का  'विशुद्धतम' रुप  निरूपित करते हुए कहते हैं कि संगीत सौंदर्य को बड़े शुद्ध रूप में प्रकट करता है। गायक के सभी साधन उसके अंतर में विद्यमान होते हैं। स्वरों का उदय उसके जीवन से होता है। उसे बाहरी उपकरणों की पराधीनता नहीं है। 
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1907 की 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख
 ' संगीत के स्वर ' में भारतीय संगीत के सूक्ष्म और शास्त्रीय ज्ञान की सराहना करते हुए लिखा था कि यूरोप वालों को मूर्च्छना और गमक आदि का अब तक ज्ञान नहीं है।साथ ही काव्यशास्त्र की तरह संगीत -शास्त्र में भी  देश बहुत बढ़ा-चढ़ा है। अपने इस लेख में उन्होंने  प्रमाणिक भारतीय संगीत ग्रंथों के उल्लेख सहित बहुत विस्तार से प्रकाश डाला। उल्लेखनीय है कि ग्वालियर में आयोजित होने वाले तानसेन संगीत समारोह के 100 वें  जलसे पर डा़. दिनेश पाठक द्वारा संपादित स्मारिका ' स्वरित ' में भी इसे पुनः प्रकाशित किया गया है ।
 इसी स्मारिका में उस्ताद अमजद अली खान का लेख 'संगीत का मूलाधार एक है' में भारतीय संगीत स्वर सा,रे,गा,मा,पा,धा,नि, की समानता यूरोपीय स्वरों डो,री,मी,फा,ला,टी से करते हुए वह लिखते हैं कि संगीत पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोता है। 
प्रोफेसर मुकंद लाठ 'स्वर और शब्द' में लिखते हैं हमारा संगीत पक्का या 'शास्त्रीय' राग-संगीत भी अपने आप को गाने में ही पहले देखता है। बजाने में बाद में। शास्त्रों में गीत को प्रधान कहा ही गया है और आज भी सहृदयों में यही मान्यता गहरी है। तभी यह सवाल उठता है कि संगीत में शब्द का स्थान क्या  है ? राग-संगीत में यह सवाल उठता ही नहीं, हमारी आज की संवेदना को सताता भी है। शिकायत रहती है कि राग-संगीत 'साहित्य' का ध्यान क्यों नहीं रखता। हमें यह लगता रहता है कि शब्द के सौंदर्य या साहित्यकता की बात तो छोड़िए, राग-संगीत के गायक  शब्दों के सही उच्चारण की भी परवाह नहीं करते पर थोड़ा सोचें तो शिकायत अजीब लग सकती है। संगीत स्वरों में होता है शब्दों में नहीं। तभी राग बजाने में उतना ही राग होता है जितना गाने में। 
सच्चिदानंद वात्स्यायन द्वारा संपादित व्याख्यान  ग्रंथ 'भारतीय कला दृष्टि' में मुकुंद लाठ ' संगीत और रस सिद्धांत:एक समस्या ' पर बोलते हुए कहते हैं " संगीत को संस्कृति की पहचान,संस्कृति का अभिज्ञान कहा जा सकता है। तात्पर्य यह है कि अगर संगीत बदले तो यह इस बात का इंगित होगा की संस्कृति बदल गई है। अगर हमारा संगीत नहीं बदला है तो इसका मतलब है कि कहीं मर्म में हम भी नहीं बदले हैं। संस्कृति कई स्तरों पर हमें ढालती है। सोचना- समझना,चिंतन-मनन, विमर्श-मीमांसा,राजनीति और समाज के विशेष विधान इत्यादि। 
कविता अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। 'भारतीय कला दृष्टि' में प्रकाशित 'आधुनिक कविता और संगीत ' विषयक अपने व्याख्यान में रघुवीर सहाय कहते हैं "कविता छापी और बांटी या बेची जाती रहे, पर बोली और सुनी भी जाये, यह आज की गतिरोध को तोड़ने का पहला कार्यक्रम इस अर्थ में हो सकता है कि यह कवि कभी भी शुरू कर सकता है- और यह भय छोड़कर शुरू करे तो और भी अच्छा की कविता बोली और सुनी जाए तो उसका अर्थ बिगड़ जाएगा। शास्त्रीय आलोचक कविता का अर्थ जितना बिगाड़ते हैं उससे ज्यादा श्रोता के हाथ में नहीं बिगाड़ सकता। अपनी एकतरफ़ा जिंदगी के भी विरुद्ध और व्यापक प्रसार साधनों के भी विरुद्ध निश्चय ही कविता बोलकर सुनाने की आवश्यकता है। 
डॉ प्रेमलता शर्मा अपने उद्बोधन में पंडित ओंकारनाथ जी ठाकुर का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि  पंडित जी संगीत की रसमय शक्ति के आचार्य थे। गायक तो थे ही, अन्य गायकों से उनका जो वैशिष्ट्य था वह यही था। उनका दावा था कि हम केवल गाते नहीं हैं, गाने के द्वारा कुछ रसबोध कराते हैं और वह भरत का  नाट्यशास्त्र पढ़कर... और इसको जनता भी जानती थी। यानी गायकों में वही केवल एकमात्र गायक थे जिन्होंने नाट्यशास्त्र का भी अध्ययन किया था और उसमें से कुछ न कुछ जोड़ने का प्रयत्न करते थे। आगे एक स्थान पर वह  कहती हैं "संगीत की अमूर्तता अन्य कलाओं के लिए एक प्रकार से कहा जाए ईशा का विषय रही है। क्योंकि हर कला के लिए अपनी अमूर्तता छोड़ना बड़ा मुश्किल है। चित्रकला के लिए तो बड़ा ही मुश्किल है। आज सब कुछ छोड़ एब्स्ट्रेक्ट आर्ट आया है पश्चिम से; कहते हैं वह इसी लिए आया है संगीत की अमूर्त्तता तक हम भी पहुंच सकें। जिस 'विशुद्ध' की बात की जा रही थी- जो निरपेक्ष हो, जिसमें हम मन में कोई अवस्था,कोई अनुभूति लेकर नहीं चलते हों--- संगीत में इसकी संभावना हमेशा से किसी न किसी रूप में थी। 
भारतीय शिल्पीयों की साधना से अभिभूत  पश्चिम में दीक्षित अत्यंत विकसित अंतश्चेतना वाले आनंद कुमार स्वामी के योगदान के स्मरण के बिना भारतीय कला चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। ' कुमार स्वामी का भारत चिंतन ' पर अपने उद्बोधन  में  विद्यानिवास मिश्र ने उनकी तत्व दृष्टि और कला दृष्टि पर विस्तार से चर्चा की थी। उन्होंने कहा" आनंद कुमार स्वामी मानते थे कि कला जिस प्रकार की कृति है,वह कृति जीवन से अलग नहीं है और जीवन दर्शन जैसा है वैसा ही कला दर्शन होता है। कला और जीवन जब अलग-अलग हो जाते हैं तभी इस प्रकार की विडम्बनापूर्ण स्थितियां पैदा होती हैं कि एक पक्ष कहता है कला कला के लिए दूसरा पक्ष कहता है कला समाज के लिए। लेकिन जब तक कला और जीवन एक रहते हैं तब तक यह द्वैतवाद, व्दैतभाव होता नहीं। 
आनंद कुमार स्वामी मानते थे जीवन में जितनी अयथेष्टा है, रिक्तता है, खालीपन है उस को भरना और भरते रहना कलाकार का काम है। उपयोगी कला और शुद्ध कला में भेद न हो मांग पर निर्भर करता है और मांग समाज से आती है। कला सृजन, रचना धर्मिता एक  प्रकार की ट्रांसफॉर्मेशन है- मिट्टी,मस्सी अथवा अन्य माध्यम का अपना महत्व है परंतु कलाकार में जो रूपांतरण की अवधारणा है वह रूपांतरण वस्तुत: समाज की ही देन है। कवि की निष्ठा,कलाकार की निष्ठा मूलत: अपने समाज के साथ होती है। समाज में वह विश्व आत्मा को देखता है। रचना तथा कला में जो नवीनता आती है वह देश-काल सापेक्ष होती है। 
आनंद कुमार स्वामी
 ' भारतीय ' को एक सनातन प्रवाह के रूप में देखते थे और यह महसूस करते थे कि भारत में कोई चीज पुरानी नहीं होती, कोई चीज नयी नहीं होती; भारत में वस्तु बार-बार पैदा होती रहती है,पुन: पुन: जायमान होती रहती है, संस्कृति पुन: पुन: जायमान होती रहती है। यह जो उषा की तरह पुन: पुनः जायमान होना है वही असली मानवीय संस्कार है। 
आनंद कुमार स्वामी ने अपने कला चिंतन को कई खण्डों में बांटा है। उन्होंने नाटक,संगीत,शिल्प और कविता पर लिखा। हस्तशिल्प पर लिखा यहां तक की कुम्हार जो मिट्टी के बर्तन बनाता है,जुलाहा जो वस्त्र बुनता है उस पर भी लिखा। उन्होंने कहा कि विभिन्न कला व्यापार अलग-अलग होते हैं लेकिन यह सभी कला व्यापार अनुस्युत हैं एक ही भाव से; उत्पन्न सामग्री के रूप में अलग-अलग हैं पर कौशल की  एकाग्रता के धरातल पर,आत्म-विसर्जन के धरातल पर, कला को चित्र संज्ञा के रूप में देखने के धरातल पर और कलाकृति को जीवन के उत्पादन के रूप में प्रायोजित मानने के धरातल पर सभी एक हैं। आनंद कुमार स्वामी का कला चिंतन इसीलिए एक समग्र चिंतन है और वह भारत की सृजक मेधा की खरी पहचान हैं।
लेखक:वरिष्ठ कलाकार,मूर्तिकार ,रिटायर्ड अधिकारी सुभाष चंद्र अरोरा जी प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग में भी रहे है।